जीवनी

स्वामी विवेकानंद हिस्ट्री व उनके जीवन से जुड़े कुछ अनमोल तथ्य

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

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पूरा नाम :नरेंद्र नाथ दत्त
जन्म :12 जनवरी 1863, कोलकता
मृत्यु :04 जुलाई 1902
गुरु जी नाम :श्री रामकृष्ण परमहंस
पिता का नाम :श्री विश्वनाथ दत्त (वकील)
माता का नाम :श्री मति भुवनेश्वर देवी
दादा जी का नाम :श्री दुर्गाचारण दुत्ता
नाना जी का नाम :श्री नन्दलाल बासु

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जो आज भी कायम है। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे.

उन्हें प्रमुख रूप से भाषण की शुरुआत “मेरे अमरीकी भाइयों एवं बहनों” के साथ करने के लिए जाना जाता है। उनके इस कहे हुए वाक्य ने हर किसी के दिल में जगह बना ली थी.

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था ?

⇓ Swami Vivekananda Life Story in Hindi ⇓

Swami Vivekananda Biography in Hindi

Swami Vivekananda Date of Birth in Hindi

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था।

स्वामी जी का जन्म एक बंगाली परिवार में हुआ था| स्वामी जी एक कायस्थ जाति में जन्मे थे। उनका पढ़ाई और आध्यात्मिकता की तरफ ध्यान लगता था। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था.

वे अपने गुरु की कही हुई बातों को मान कर ही काम किया करते थे। गुरु के अनुसार उन्होंने सिखा की “सारे जीव स्वंय परमात्मा का ही एक अवतार हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है.

उनके गुरु रामकृष्ण जी की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत स्थितियों को जाना और उसके बाद धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, अमेरिका के लिए निकल पड़े.

विवेकानंद ने अमेरिका, इंग्लैण्ड और यूरोप में हिन्दू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया, उन्होंने सैंकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया.

विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है.

स्वामी विवेकानंद का बचपन कैसा था ?

History of Swami Vivekananda in Hindi

History of Swami Vivekananda in Hindi

उनके दादा जी संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को 25 साल की उम्र में ही छोड़ दिया और एक साधु बन गए थे| स्वामी जी के पिता जी हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे.

उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं| स्वामी जी भगवान शिव की पूजा में ही अधिकांश समय दिया करते थे| उनके माता-पिता के धार्मिक, अतर्कसंगत और प्रभावशील व्यवहार ने स्वामी जी पर अपनी छाप छोड़ी है.

स्वामी जी के घर पूजा-पाठ का माहौल हमेशा बना रहा और जिसका स्वामी जी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा, स्वामी जी अपनें साथियों के साथ खेलने जाया करते थे| वे बहुत ही नटखट थे वे अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत किया करते थे.

घर में पूजा पाठ होने के नाते उनके घर कथा-वाचकों का आना जाना हमेशा ही रहता था| कथा भजन कीर्तन हमेशा ही उनके घर में हुआ करते थे.

घर में होने वाले पूजा पाठ की वजह से स्वामी जी के अन्दर भगवान् का वास होने लगा था वे भगवान् में अपनी रूचि लेने लगे थे.

वे भगवान् की भक्ति में इतने माहिर हो गए थे की कभी कभी अपने माता-पिता और कथा वाचक पंडितों आदि से ऐसे ऐसे प्रशन पूंछ बैठते थे की वे लोग सोचते रह जाते थे.

Swami Vivekananda Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद जी ने शिक्षा को लेकर जो जो कहा उन सभी बातों ने जीवन बदल कर रख दिया है। अपना जीवन औरों से अलग बनाने के लिए जो भी स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है वो कहीं न कहीं सबसे सच मानी जाती है।

मेरा मानना है कि यदि आप भी स्वामी विवेकानंद जी की इन बातों को अपने जीवन में उतार लेंगे तो अवश्य ही अपने जीवन में बदलाव देखने को मिलेंगे। आपका जीवन सुखमय हो इस लिए आप इन बातों को अपने जीवन में उतार लें यही बहुत होगा।

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धांत निम्नलिखित हैं।

  1. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
  2. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
  3. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
  4. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
  5. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
  6. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
  7. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
  8. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
  9. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
  10. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
  11. शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष से लड़ने की शक्ति दे।

बड़ी सोच के साथ स्वामी विवेकानंद जी का बच्चों की शिक्षा पर विचार “मनुष्य-निर्माण” की प्रक्रिया पर केन्द्रित हैं, न कि महज किताबी ज्ञान पर। एक पत्र में वे लिखते हैं-

शिक्षा क्या है? क्या वह पुस्तक-विद्या है?

  • नहीं!

क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है?

  • नहीं,

यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है

शिक्षा का उपयोग किस प्रकार चरित्र-गठन के लिए किया जाना चाहिए, इस विषय में स्वामी जी कहते हैं, शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग़ में ऐसी बहुत-सी बातें इस तरह ठूँस दी जाए, जो आपस में, लड़ने लगें और तुम्हारा दिमाग़ उन्हें जीवन भर में हज़म न कर सके।

जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।

यदि तुम पाँच ही भावों को हज़म कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कंठस्थ कर ली है।

किसी भी देश की उन्नति-फिर चाहे वह अर्थव्यवस्था में हो या आध्यात्मिक में स्वामी जी शिक्षा की भूमिका केन्द्रीय मानते थे। भारत तथा पश्चिम के बीच के अन्तर को वे इसी दृष्टि से वर्णित करते हुए कहते हैं…

“केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ? जवाब पाया – शिक्षा!

स्वामी विवेकानंद का विचार था कि उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकसित होना चाहिए और चरित्र की उन्नति होनी चाहिए। सन् 1800 में लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी जी यही बात सामने रखते हैं…

हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।”

सरल भाषा में स्वामी विवेकानंद जी का कहना है कि यदि आपकी शिक्षा दिखावे की होगी तो आप कभी भी अच्छे व कुशल व्यक्ति नहीं बन सकते है। यदि आपकी शिक्षा अपने जीवन को सरल बनाने के लिए अच्छे से की गयी होगी तो आप को कोई भी पीछे नहीं कर सकता है।

स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षा और स्वामी विवेकानंद जीवनी

आठ साल की उम्र में स्वामी जी ने ईश्वर चन्द्र `विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संसथान में दाखिला लिया.

सन् 1877 में, उनका परिवार रायपुर चला गया| सन् 1879 में कलकत्ता में उनका परिवार वापस आ गया और जब स्वामी केवल एक छात्र थे| स्वामी जी ने प्रेसिडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिविजन प्राप्त किया.

उन्हें दर्शन (philosophy), धर्म, इतिहास, सामजिक विज्ञान, कला और साहित्य जैसे विषयों को पढने के शौक़ था| उनका वेद-पुराण, भागवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों हिन्दू शास्त्र आदि में भी बहुत रूचि थी स्वामी को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया.

स्वामी जी नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व् खेलों में भाग लिया करते थे| स्वामी ने पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेम्बली इंस्टिट्यूट(स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया.

सन् 1881 में इन्होने ललित कला की परीक्षा पास की, सन् 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली.

उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन(1861) को बंगाली में लिखा. पश्चिमी दार्शनिको के अध्ययन के साथ ही इन्होने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सिखा.

महासभा साथ के प्रिंसीपल ने लिखानरेंद्र (स्वामी) वास्तव में एक जीनियस है| मैंने काफी जगहों की इलाकों की यात्रा की है मगर स्वामी जैसा कोई भी बालक नहीं देखा है यहाँ तक की जर्मन विश्वविधालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं.”  

कई बार इन्हें श्रुतिधर (विलक्ष्ण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है.

ब्रह्म समाज का प्रभाव – स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

Swami Vivekananda Biography in Hindi

Swami Vivekananda Biography In Hindi

सन् 1880 में, केशव चन्द्र सेन जो इसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित हुए जिनके नव विधान में स्वामी शामिल हुए, स्वामी 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लोज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग संघ था और जो केशव चन्द्र सेन और देवेन्द्र टैगोर के नेतृत्व में था.

सन् 1881 – 1884 के दौरान ये “सेन्स बैंड ऑफ़ होप” में भी जागरूक थे जो धुम्रपान और शराब पीने से युवाओं को  हतोत्साहित करता था.

 “कार्य और धर्म” में लगन-निष्ठा :

स्वामी गुरु भक्त थे और उन्हें गुरु भक्ति में बहुत ज्ञान मिला जिससे युवा पीढ़ी को बहुत कुछ सिखने को मिला है.

गुरु जी की हालत ठीक नहीं थी वे बीमार थे| स्वामी जी ने बिना किसी भी परेशानी के बिना किसी घिन्न के अपने गुरु की सेवा की, उनके गुरु प्रेम में वह गुरु जी के बिस्तर पर जहाँ रक्त की बूँदें, कफ आदि से भरी थूकदानी को साफ़ किया करते थे.

ये देखते हुए एक शिष्य ने घृणा दिखाई और नाक भी सिकौड़ी| यह देख कर स्वामी को क्रोध आया और उन्होंने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ सिखाया.

गुरु के प्रति इस प्रेम लगाव से वे गुरु को अच्छी तरह समझ सकें और बहुत कुछ सिख सके.

स्वामी विवेकानंद अपना जीवन गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे| स्वामी, गुरु जी के अंतिम दिनों में गुरु की सेवा में लगे रहे और भोजन पर भी ध्यान नहीं दे पाए.

विवेकानंद जी एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमे किसी भी प्रकार की मानव् भेद भाव न हो सब व्यक्ति समान हो और एक दुसरे को सम्मान दे| स्वामी जी को युवाओं से बहुत ही उम्मीदें थी.

आज के ओजस्वी सन्यासी का जीवन मतलब युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद जी का जीवन एक “आदर्श“ है.

स्वामी जी का मशहूर भाषण – स्वामी विवेकानंद के शिक्षा के उद्देश्य

स्वामी जी ने एक भाषण दिया था| जिस भाषण में स्वामी जी को प्राप्त शिक्षा का सही मतलब पता चलता है.स्वामी जी से बहुत् कुछ सिखने योग्य बातें पता चलती है.

स्वामी विवेकानंद भाषण

“मेरे अमरीकी भाइयों और बहनों”

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है| संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की और से आपको धन्यवाद देता हूँ.

धर्मों की माता की और से धन्यवाद देता हूँ, और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की और से भी धन्यवाद देता हूँ.

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है की सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचलित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं.

में एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभोम स्वीकृत दोनों की ही शिक्षा दी है.

हम लोग सभी धर्मों में विश्वास रखते हैं और सभी धर्मों को मानते है| मुझे ये कहने में बहुत ही गर्व महसूस होगा की में एक ऐसे देश का रहने वाला हूँ जो पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है.

मुझे आपको ये बताते हुए गर्व होता हैं की हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धुल में मिल गया था.

ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व महसूस करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है.

भाइयों में आप लोगों को एक वाक्य की कुछ पंक्तियां सुनाता हूँ जिसकी आवर्ती मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवर्ती प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते है.

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् |
नृणामेको गम्यस्त्व्मसी पयसामर्णव इव ||

इसका अर्थ है की जैसे विभिन्न नदियाँ अलग अलग स्रोतों से निकलकर संमुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! अलग अलग रूचि के अनुसार विभिन्न टेडे-मेंडे या सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते है.

यह सभा जो गीता के अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है.

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव् भजाम्यहम |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ||

इसका अर्थ है जो कोई मेरी और आता है चाहे किसी प्रकार से हो  मैं उसको प्राप्त होता हूँ| लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए आखिर मे मेरी ही ओर आते है.

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभस्त वंशधर धर्म की अन्धता इस सुन्दर पृथ्वी प् बहुत समय तक राज्य कर चुकी है.

वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है व् उसको बार-बार मानवता के खून से नहलाती रही है, सभ्याताओं को खत्म करती हुई पुरे के पुरे देशों को निराशा  में डालती है.

यदि ये बुरी शक्तियां न होती तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता.

पर अब उनका समय आ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ की आज सुबह की घंटी बजी है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की और अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो.

Swami Vivekananda Essay in Hindi

Swami Vivekananda Essay in Hindi

स्वामी विवेकानंद की यात्राएं

25 वर्ष की उम्र में ही स्वामी ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था| उसके बाद पैदल ही पुरे भारत की यात्रा कर डाली.

सन् 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी| स्वामी ने भारत के प्रतिनिधित्व के रूप में भाग लिया.

योरोप-अमरीका के लोग उस समय भारतियों को बहुत हीन ,निचा, तुच्छ समझते थे| जिस कारण उन लोगों ने पूरी कोशिश कर डाली की स्वामी को सर्वधर्म परिषद में बोलने का समय न मिले.

परन्तु एक अमरीकी प्रोफेसर की वजह से उन्हें थोडा समय मिला| स्वामी जी के उच्च विचार सुन कर उस सभा में आये हुए लोग हैरान रह गये. उसके बाद क्या था स्वामी जी अमेरिका में बहुत बड़ी मात्रा में सम्मानित किये गए और उनके भक्तों का बड़ा समुदाय बन गया|

तीन वर्ष वे अमेरिका में ही रहे और वंहा के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की|स्वामी जी का प्रभाव इतना पड़ा की वहां की मीडिया ने उन्हें “साइक्लोनिक हिन्दू” का नाम दिया.

“आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा|” यह स्वामी विवेकनद का मजबूत विश्वास गरीबों की  सेवक कहते थे.

उन्होंने रामकृष्ण मिशन की कई शाखाएं स्थापित की| अमेरिकी लोगों ने उनकी सिक्षा प्राप्त की|वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे|

स्वामी विवेकानंद का योगदान और महत्व – स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

उन्तालिस वर्ष की कम आयु में ही वे इतने काम कर गए की आने वाली पीडियां उनके मार्ग पर चेलेंगी|

केवल तीस साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मलेन में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व किया उसे एक पहचान दिलायी.

गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था– “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढिये| उनमे आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.”

रोमो रेला ने कहा था-“उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम ही रहे| हर कोई उनमे अपने नेता का दर्शन करता है| वे भगवान के प्रतिनिधित्व थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशेषता थी.

हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और चिल्ला कर बोला “शिव्“ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के भगवान ने अपना नाम माथे पर लिख दिया हो”

अमेरिका से आते वक्त उन्होंने देशवासियों को बुलाया और कहा-“नया भारत निकल पड़े मोची की दूकान से, भाईभुन्जे के भाड से, कारखाने से, हाट से,बाजार से, निकल पड़े झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों,पर्वतों से|”उनके उत्तर में जनता ने कहा की वह गर्व के साथ निकल पड़े हैं.

गांधीजी को आजादी के समय सबसे ज्यादा जन-समर्थन की मजबूती स्वामी जी की तरफ ही मिली था.

उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है| यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व् ऋषियों का जन्म हुआ है, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यही केवल यही-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है.

उनका कथन_”उठो,जागों ,स्वयं जागकर औरों को जगाओं| अपने नर-जन्म को सफल करों और तब तक नहीं रुकना जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए|”

स्वामी जी का कहना था की उन्निसवीं सदी के अन्तिम वर्षों मैं  लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रांति के जरिये भी देश को आजाद कराया जा सकता है| मगर उनको ये यह विश्वास हो गया की स्थितियां उनके विरुद्ध है.

उसके बाद स्वामी जी ने “एकला चलो की नीति का पालन किया एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला.

स्वामी जी ने कहा की मुझे बहुत से युवा सन्यासी चाहिए जो भारत के गाँवों में फैलकर देशवासियों की सेवा में लग जाएँ| उनका यह सपना पूरा न हो सका.

विवेकानंद पुरोहितवाद,धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रुढियों के सख्त खिलाफ थे| उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केंद्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया.

उन्होंने एक बयान में कहा था की तैंतीस करोड़ भूखे, गरीब और कुपोषण के शिकार लोगों को भगवान  की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए.

इस ब्यान की वजह से पुरे पुरोहित वर्ग की घिन्घी बंध गई थी| आज कोई दूसरा साधु तो क्या सरकारी मशीन भी किसी अवैध मंदिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती.

स्वामी जी ने कहा की धरती की गोद में यदि एसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह से बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिश की है, तो वह भारत ही है.

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु का कारण – Swami Vivekananda Death Information in Hindi

जीवन के आखरी दिनों में स्वामी ने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा- “एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है.”

04 जुलाई 1902 को स्वामी जी ने अंतिम दिन भी रोज की तरह दिनचर्या नहीं बदली और सुबह दो तीन घंटे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध को भेदकर महासमाधी ले ली| बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अन्येष्टि की गयी.

इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अंतिम संस्कार हुआ था.

Swami Vivekananda Quotes in Hindi For Youth and Students
पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के अनमोल विचारशाहरुख खान के अनमोल विचार
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स्वामी विवेकानंद के सुविचार

1. उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये।


स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार

2. खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप हैं।


Swami Vivekananda Quotes in Hindi

3. तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता, कोई आध्यात्मिक नहीं बना सकता। तुमको सब कुछ खुद अंदर से सीखना हैं। आत्मा से अच्छा कोई शिक्षक नही हैं।


Swami Vivekananda Motivational Quotes in Hindi

4. सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।


Swami Vivekananda Quotes in Hindi

5. बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप हैं।


स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार

6. ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हमही हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार हैं।


Swami Vivekananda Quotes & Thoughts in Hindi

7. विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।


स्वामी विवेकानंद के कोट्स

8. दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो।


Swami Vivekananda Inspirational Hindi Quotes

9. शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं।


Swami Vivekananda Quotes in Hindi

10. किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।


Swami Vivekananda Quotes in Hindi For Students

11. एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।


Swami Vivekananda Thoughts in Hindi

12. “जब तक जीना, तब तक सीखना” – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।


Swami Vivekananda Suvichar in Hindi

13. जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते।


Swami Vivekananda ke Anmol Vachan

14. जो अग्नि हमें गर्मी देती है, हमें नष्ट भी कर सकती है, यह अग्नि का दोष नहीं हैं।


Quotes of Swami Vivekananda in Hindi

15. चिंतन करो, चिंता नहीं, नए विचारों को जन्म दो।


स्वामी विवेकानंद के विचार

16. हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।


17. जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।


18. कुछ मत पूछो, बदले में कुछ मत मांगो। जो देना है वो दो, वो तुम तक वापस आएगा, पर उसके बारे में अभी मत सोचो।


19. जो कुछ भी तुमको कमजोर बनाता है – शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्याग दो।


20. तुम फ़ुटबाल के जरिये स्वर्ग के ज्यादा निकट होगे बजाये गीता का अध्ययन करने के।


21. वेदान्त कोई पाप नहीं जानता, वो केवल त्रुटी जानता है। और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो, तुम पापी हो, एक तुच्छ प्राणी हो, और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम ये-वो नहीं कर सकते।


22. किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये।


23. यही दुनिया है; यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को बंद कर दो, वे तुरन्त तुम्हें बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचाएंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वारा ठगे जाते हैं।


24. सच्ची सफलता और आनंद का सबसे बड़ा रहस्य यह है- वह पुरुष या स्त्री जो बदले में कुछ नहीं मांगता। पूर्ण रूप से निःस्वार्थ व्यक्ति, सबसे सफल हैं।


25. एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका हैं।


26. क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खड़ा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।


27. जब लोग तुम्हे गाली दें तो तुम उन्हें आशीर्वाद दो। सोचो, तुम्हारे झूठे दंभ को बाहर निकालकर वो तुम्हारी कितनी मदद कर रहे हैं।


28. हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।


29. जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो; वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही हैं।


30. यदि स्वयं में विश्वास करना और अधिक विस्तार से पढ़ाया और अभ्यास कराया गया होता, तो मुझे यकीन है कि बुराइयों और दुःख का एक बहुत बड़ा हिस्सा गायब हो गया होता।


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– Swami Vivekanand Ka Jeevan Parichay

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