नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जीवनी – शिक्षा और आन्दोलन सहित पूरी जानकारी हिंदी में

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जन्म :23 जनवरी 1897 जन्मस्थान : कटक (ओड़िसा)
मृत्यु :18 अगस्त 1945
माता-पिता :श्री जानकी नाथ बोस और प्रभावती देवी
बच्चे :श्रीमति अनीता बोस फाक
पत्नी :श्रीमति एमिली शेंकल
राष्ट्रीयता :भारतीय
जाती धर्म :बंगाली लोग,हिन्दू
शिक्षा :1919 बी०ए० (ओनर्स), 1920 आई.सी.एस.पारीक्षा उत्तीर्ण
शिक्षा प्राप्ति :कलकत्ता विश्वविधालय
पद :अध्यक्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1938)
पार्टी :भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1921-1940), फॉरवर्ड ब्लॉक (1939- 1940)
अन्य सम्बंधी :श्री शरदचन्द्र बोस भाई और श्री शिशिर कुमार बोस भतीजा

Table of Contents

सुभाष चंद्र बोस की जीवनी हिंदी में

सुभाष चन्द्र बोस जिन्हें सभी लोग नेता जी के नाम से भी जानते है, भारत के स्वतंत्र होने में उनका महत्वपूर्ण योग दान था.

द्वितीय विश्वयुद्ध (second world war) अंग्रेजों के खिलाफ जापान की सहायता से भारतीय राष्ट्रीय सेना का निर्माण किया था| जो “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से जानी जाती है| सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद की कही हुई बातों पे अमल करते थे.

सुभाष चन्द्र बोस का कथन

“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा”

प्रसिद्ध नारा था| जिसे पूरा भारत जनता है| कुछ लोगों का मानना था की जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहयोग लेने का प्रयत्न किया तो
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मारने के लिए 1914 में अपने गुप्तचर भेजे थे.

1920 के अंत ने बोस राष्ट्रीय युवा कांग्रेस के बड़े नेता माने गए और सन् 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने.

1939 में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के चलते हुए विवाद के कारण अपने पद को छोडना पड़ा और 1940 में भारत छोड़ने से पहले ही उन्हें ब्रिटिश ने अपने गिरफ्त में कर लिया था| अप्रैल 1941 को बोस को जर्मनी ले जाया गया.

05 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने “सुप्रीम कमांडर” बन कर सेना को संबोधित करते हुए “दिल्ली चलो” का नारा लागने वाले सुभाष चन्द्र बोस ही थे.

जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश और कॉम्मनवेल्थ सेना से बर्मा, इम्फाल, और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लगाया|

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय

Subhash Chandra Bose Biography in Hindi

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज के सर्वोच्च सेनापती के पद से स्वतंत्र भारत की अस्थिर सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फीलिपींस, कोरिया, चीन, ईटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी.

जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थिर सरकार को सौंपा और सुभाष उन द्वीपों में गए और उनको नया नाम दिया.

कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लडा गया एक भयंकर युद्ध माना गया और इस युद्ध में जापानी सेना की हार हुई.

जापान में 18 अगस्त को उनका जन्म दिन बड़े ही धूमधाम से आज भी मनाया जाता है और वहीँ भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का कहना है की सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु सन् 1945 में हुई ही नहीं थी.

वे रूस में नजरबन्द थे और यदि ये बात गलत है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से सम्बंधित् दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया? इस बात को लेकर आज भी विवाग है.

कलकत्ता हाई कोर्ट ने नेताजी के लापता होने के रहस्य को लेकर ख़ुफ़िया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग को जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए स्पेशल बैंच के गठन का आदेश दिया था.

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म कहाँ हुआ था और कब हुआ था?

23 जनवरी 1897 को कटक (ओडिशा) शहर में सुभाष चन्द्र बोस का जन्म हुआ| उनके पिता श्री जानकीनाथ बोस और माँ श्रीमती प्रभावती थे.

सुभाष जी के पिता जी शहर के मशहूर वकील थे| पहले वे सरकारी वकील थे फिर उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी.

उन्होंने कटक की महापालिका में लम्बे समय तक का काम किया और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे| उन्हें रायबहादुर का ख़िताब भी अंग्रेजॉन द्वारा मिला.

सुभाष चन्द्र के नानाजी का नाम गंगानारायण दत्त था| दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन कायस्थ परिवार माना जाता था| सुभाष चन्द्र बोस को मिला कर वे 6 बेटियां और 8 बेटे यानि कुल 14 संताने थी.

सुभाष चन्द्र जी 9 स्थान पर थे| कहा जाता है की सुभाष चन्द्र को अपने भाई शरद चन्द्र से सबसे अधिक लगाव था| शरद बाबु प्रभावती जी और जानकी नाथ के दुसरे बेटे थे| शरद बाबु की पत्नी का नाम विभावती था.

सुभाष चन्द्र बोस की शिक्षा और आई.सी.एस. का सफर

प्राइमरी शिक्षा कटक के प्रोटेस्टैंड यूरोपियन स्कूल से पूरी की और 1909 में उन्होंने रेवेनशा कोलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया.

उन पर उनके प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव पड़ा वे विवेकानंद जी के साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया था.

सन् 1915 में उन्होंने इण्टरमिडियेट की परीक्षा बीमार होने पर भी दूसरी श्रेणी में उत्तीर्ण की| 1916 में बी० ए० (ऑनर्स) के छात्र थे.

प्रेसिडेंसी कॉलेज के आध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया| सुभाष ने छात्रों का साथ दिया जिसकी वजह से उन्हें एक साल के लिए निकाल दिया और परीक्षा नहीं देने दी.

उन्होंने बंगाली रेजिमेंट में भर्ती के लिए परीक्षा दी मगर आँखों के खराब होने की वजह से उन्हें मना कर दिया गया| स्कॉटिश चर्च में कॉलेज में उन्होंने प्रवेश किया लेकिन मन नहीं माना क्योंकि मन केवल सेना में ही जाने का था.

जब उन्हें लगा की उनके पास कुछ समय शेष बचता है तो उन्होंने टेटोरियल नामक आर्मी में परीक्षा दी और उन्हें विलियम सेनालय में प्रवेश मिला| और फिर बी०ए० (ऑनर्स) में खूब मेहनत की और सन् 1919 में एक बी०ए० (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम आकर पास की| और साथ में कलकत्ता विश्वविधालय में उनका स्थान दूसरा था.

उनकी अब उम्र इतनी हो चुकी थी की वे केवल एक ही बार प्रयास करने पर ही आईसीएस बना जा सकता था.

उनके पिता जी की ख्वाहिश थी की वे आईसीएस बने और फिर क्या था सुभाष चन्द्र जी ने पिता से एक दिन का समय लिया| केवल ये सोचने के लिए की आईसीएस की परीक्षा देंगे या नही|

इस चक्कर में वे पूरी रात सोये भी नहीं थे| अगले दिन उन्होंने सोच लिया की वे परीक्षा देंगे.

वे 15 सितम्बर 1919 को इंग्लॅण्ड चले गए| किसी वजह से उन्हें किसी भी स्कूल में दाखिला नही मिला फिर क्या था उन्होंने अलग रास्ता निकाला|

सुभाष जी ने किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक ज्ञान की ट्राईपास (ऑनर्स) की परीक्षा के लिए दाखिला लिया इससे उनके रहने व खाने की समस्या हल हो गयी| और फिर ट्राईपास (ऑनर्स) की आड़ में आईसीएस की तैयारी की और 1920 में उन्होंने वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त कर परीक्षा उत्तीर्ण की|

स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों और ज्ञान ने उन्हें अपने भाई शरतचन्द्र से बात करने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने एक पत्र अपने बड़े भाई शरतचंद्र को लिखा जिसमे उन्होंने पुछा की में आईसीएस बन कर अंग्रेजों की सेवा नहीं कर सकता.

फिर उन्होंने 22 अप्रैल 1921 को भारत सचिव ई०एस० मांटेग्यु को आईसीएस से त्यागपत्र दिया.

एक पत्र देशबंधु चित्तरंजन दस को लिखा| उनके इस निर्णय में उनकी माता ने उनका साथ दिया उनकी माता को उन पर गर्व था| फिर सन् 1921 में ट्राईपास (ऑनर्स) की डिग्री ले कर अपने देश वापस लौटे.

भारत की आजादी में सुभाष चन्द्र जी का योगदान

सुभाष चन्द्र बोस ने ठान ली थी की वे भारत की आजादी के लिए कार्य करेंगे| वे कोलकाता के देशबंधु चित्तरंजन दास से प्रेरित हुए और उनके साथ काम करने के लीये इंग्लॅण्ड से उन्होंने दस्बबू को पत्र लिखा और साथ में काम करने के लिए अपनी इच्छा जताई.

कहा जाता है की रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार ही सुभाष जी मुंबई गए और महात्मा गाँधी जी से मिले.

सुभाष जी, महात्मा गाँधी जी से 20 जुलाई 1921 को मिले और गाँधी जी के कहने पर सुभाष जी कलकाता जाकर दासबाबु से मिले.

असहयोग आन्दोलन का समय चल रहा था| दासबाबु और सुभाष जी इस आन्दोलन को बंगाल में देख रहे थे.

दासबाबु ने सन् 1922 कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की| अंग्रेज सरकार का विरोध करने के लिए कोलकाता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्ट्री ने विधानसभा के अन्दर से लड़ा और जीता.

फिर क्या था दासबाबू कोलकाता के महापौर बन गए और इस अधिकार से उन्होंने सुभाष चन्द्र को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बना दिया.

सुभाष चन्द्र ने सबसे पहले कोलकाता के सभी रास्तों के नाम ही बदल डाले और भारतीय नाम दे दिए| उन्होंने कोलकाता का रंगरूप ही बदल डाला.

सुभाष देश के महत्वपूर्ण युवा नेता बन चुके थे| स्वतंत्र भारत के लिए जिन लोगों ने जान दी थी उनके परिवार के लोगों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी.

सुभाष जी की पंडित जवाहर लाल नेहरु जी के साथ अच्छी बनती थी| उसी कारण सुभाष जी ने जवाहर लाल जी के साथ कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडेंटस लिग शुरू की|

सन् 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया था तब कांग्रेस के लोगों ने उसे काले झंडे दिखाए और कांग्रेस ने आठ लोगों की सदस्यता आयोग बनाया ताकि साइमन कमीशन को उसका जवाब दे सके, सुभाष ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया.

उस आयोग में मोतीलाल नेहरु अध्यक्ष और सुभाष जी सदस्य थे|

आयोग ने नेहरु रिपोर्ट पेश की और और कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ| ये बात सन् 1928 में हुआ था, सुभाष चन्द्र जी ने खाकी कपडे पहन के मोतिलाल जी को सलामी दी थी.

इस अधिवेशन में गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार से पूर्ण स्वराज की जगह डोमिनियन स्टेट्स मांगे.

सुभाष और जवाहर लाल जी तो पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे| लेकिन गाँधी जी उनकी बात से सहमत नहीं थे.

आखिर में फैसला ये हुआ की गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार को 2 साल का वक्त दिया जिसमे डोमिनियन स्टेट्स वापस दे दिया जाए, मगर सुभाष और जवाहर लाल जी को गाँधी जी का ये निर्णय अच्छा नहीं लगा और गाँधी जी से 2 साल की वजह अंग्रेजी सरकार को 1 साल का वक्त देने को कहा.

निर्णय ये हुआ की अगर 1 साल में अंग्रेज सरकार ने डोमिनियन स्टेट्स नहीं दिए तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी| लेकिन अंग्रेज सरकार के कानो के नीचे जूं भी नहीं रेंगा.

अंत में आकर सन् 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता का दिन मनाया जाएगा.

कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फ़हरा कर सुभाष बड़ी मात्रा में लोगों के साथ मोर्चा निकल रहे थे| 26 जनवरी 1931 की बात है ये उनके इस कारनामे से पुलिस ने उन पर लाठीयां चलाई और उन्हें घायल कर जेल में भेज दिया.

गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार से समझोता किया और सभी कैदियों को जेल से सुभाष चन्द्र सहित छुड़ा लिया और अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह जैसे बहादुर क्रांतिकारी को आजाद करने से मना कर दिया.

गाँधी जी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए अंग्रेज सरकार से बात की मगर नरमी के साथ सुभाष जी कभी नहीं चाहते थे की ऐसा हो उनका कहना था की गाँधी जी इस समझौते को तोड़ दे| मगर कहा जाता है की गाँधी जी अपने दिए हुए वचन को कभी नहीं तोड़ते थे.

अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह व उनके साथ काम करने वालों को फांसी दे दी और सुभाष चन्द्र जी के दिलों दिमाग में आग लगा दी उन्हें गाँधी जी
और कांग्रेस के तरीके बिलकुल पसंद नहीं आये.

कितनी बार कारावास जाना पड़ा सुभाष चन्द्र बोस को ?

पुरे जीवन में सुभाष चन्द्र जी को करीब 11 बार कारावास हुआ| 16 जुलाई 1921 में छह महीने का कारावास हुआ.

गोपनीथ साहा नाम के एक क्रांतिकारी ने सन् 1925 मे कोलकाता की पुलिस में अधिकारी चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहा मगर गलती से अर्नेस्ट डे नाम के व्यापारी को मार दिया| जिस वजह से गोपीनाथ को फांसी दे दी गयी.

इस खबर से सुभाष चन्द्र जी फूट फूट कर रोये और गोपीनाथ का मृत शरीर मांगकर अंतिम संस्कार किया.

सुभाष चन्द्र जी के इस कार्य से अंग्रेजी सरकार ने सोचा की सुभाष चन्द्र कहीं क्रांतिकारियों से मिला हुआ तो नहीं है या फिर क्रांतिकारियों को हमारे लिए भड़काता है.

किसी बहाने अंग्रेज सरकार ने सुभाष को गिरफ्तार किया और बिना किसी सबुत के बिना किसी मुक़दमे के सुभाष चन्द्र को म्यांमार के मांडले
काराग्रह में बंदी बनाकर डाल दिया.

चित्तरंजन दास 05 नवम्बर 1925 को कोलकाता में चल बसे| ये खबर रेडियो में सुभाष जी ने सुन ली थी.

कुछ दिन में सुभाष जी की तबियत ख़राब होने लगी थी उन्हें तपेदिक हो गया था| लेकिन अंग्रेजी सरकार ने उन्हें रिहा फिर भी नही किया था.

सरकार की शर्त थी की उन्हें रिहा जभी किया जायेगा जब वे इलाज के लिए यूरोप चले जाए, मगर सुभाष चन्द्र जी ने ये शर्त भी ठुकरा दी क्योंकि सरकार ने ये नहीं बात साफ़ नहीं की थी की सुभाष चन्द्र जी कब भारत वापस आ सकेंगे.

पर अब अंग्रेजी सरकार दुविधा में पड गयी थी क्योंकि सरकार ये भी नहीं चाहती थी की सुभाष चन्द्र जी कारावास में ही खत्म हो जाए| इसलिए सरकार के रिहा करने पर सुभाष जी ने अपना इलाज डलहौजी में करवाया.

सन् 1930 में सुभाष कारावास में ही थे और चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुन लिया गया था| जिस कारण उन्हें रिहा कर दिया गया.

सन् 1932 में सुभाष जी को फिर कारावास हुआ और उन्हें आल्मोड़ा जेल में रखा गया, आल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत फिर ख़राब हो गयी, चिकित्सकों की सालाह पर वे यूरोप चले गए.

यूरोप में रह कर देशभक्ति – Subhash Chandra Bose Biography in Hindi

सन् 1933-1936 सुभाष जी यूरोप में ही रहे| वहां वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने का वादा किया.

आयरलैंड के नेता डी वलेरा सुभाष के अच्छे मित्र बन गए| उन दिनों जवाहर लाल जी की पत्नी कमला नेहरु का आस्ट्रिया में निधन हो गया, सुभाष जी ने जवाहर जी को वहां जा कर हिम्मत दी.

बाद में विठ्ठल भाई पटेल से भी मिले| विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाष ने मत्रना की जिसे पटेल व बोस की विश्लेषण के नाम से प्रसिद्धि मिली.

उस वार्तालाप में उन दोनों ने गाँधी जी की घोर निंदा की, यहाँ तक की विठ्ठल भाई पटेल के बीमार होने पर सुभाष जी ने उनकी सेवा भी की मगर विठ्ठल भाई पटेल जी का निधन हो गया.

विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी सारी संपत्ति सुभाष जी के नाम कर दी और सरदार भाई पटेल जो विठ्ठल भाई पटेल छोटे भाई थे उन्होंने इस वसीयत को मना कर दिया और मुकदमा कर दिया.

मुकदमा सरदार भाई पटेल जीत गये और सारी संपत्ति गाँधी जी के हरिजन समाज को सौंप दी.

सन् 1934 में सुभाष जी के पिता जी की म्रत्यु हो गयी| जब उनके पिता जी मृत्युशय्या पर थे तब वे कराची से हवाई जहाज से कोलकाता लौट आये| मगर देर हो चुकी थी.

कोलकाता आये ही थे की उन्हें अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और करावास में डाल दिया और बाद में यूरोप वापस भेज दिया.

प्रेम विवाह हुआ था सुभाष चन्द्र जी का – History of Subhash Chandra Bose in Hindi

History of Subhash Chandra Bose in Hindi

आस्ट्रिया में जब वे अपना इलाज करवा रहे थे तब उन्हें अपनी पुस्तक लिखने के लिए अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की जरुरत पड़ी.

उनकी मुलाकात अपने मित्र द्वारा एक महिला से हुई जिनका नाम एमिली शेंकल था| एमिली के पिता जी पशुओं के प्रसिद्ध चिकित्सक थे| ये बात सन् 1934 की थी.

एमिली और सुभाष जी एक दूसरे की और आकर्षित हुए और प्रेम करने लगे| उन्होंने हिन्दू रीतिरिवाज से सन् 1942 में विवाह कर लिया और उनकी एक पुत्री हुई.

सुभाष जी ने जब वो बच्ची चार सप्ताह की थी बस तभी देखा था और फिर अगस्त सन् 1945 में ताद्वान में उनकी विमान दुर्घटना हो गयी और उनकी मृत्यु हो गयी जब उनकी पुत्री अनीता पौने तीन साल की थी.

अनीता अभी जीवित है और अपने पिता के परिवार जानो से मिलने के लिए भारत आती रहती हैं.

हरीपूरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद – Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

सन् 1938 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में हुआ| कांग्रेस के 51वां अधिवेशन था इसलिए उनका स्वागत 51 बैलों द्वारा खींचे गए रथ से किया गया| इस अधिवेशन में उनका भाषण बहुत ही प्रभाव शाली था.

सन् 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया| सुभाष जी ने चीनी जनता की सहायता के लिए डा० द्वारकानाथ कोटिनस के साथ चिकित्सा दल भेजने के लिए निर्णय लिया.

भारत की स्वतंत्रता संग्राम में जापान से सहयोग लिया| कई लोगों का कहना था की सुभाष जी जापान की कठपुतली और फासिस्ट कहते थे| मगर ये सब बातें गलती थी.

गाँधी जी की जिद की वजह से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा

सन् 1938 में गाँधी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना था लेकिन सुभाष जी की कार्य पद्धति उन्हें पसंद नहीं आयी और द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे.

सुभाष जी ने सोचा की क्यों न इंग्लॅण्ड की इस कठिनाई का फायदा उठा कर भारत का स्वतंत्रता संग्राम में तेजी लाइ जाए| परन्तु गाँधी जी इस से सहमत नहीं हुए.

सन् 1939 में जब दुबारा अध्यक्ष चुनने का वक्त आया तब सुभाष जी चाहते थे की कोई ऐसा इंसान अध्यक्ष पद पर बैठे जो किसी बात पर दबाव न बर्दाश्त करें और मानवजाति का कल्याण करें.

जब ऐसा व्यक्ति सामने नहीं आया तो उन्होंने दुबारा अध्यक्ष बनने का प्रताव रखा तो गाँधी जी ने मना कर दिया.

दुबारा अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभी सीतारामैय्या को चुना, मगर कवी रविन्द्रनाथ ठाकुर ने गाँधी जी को खत लिखा और कहा की अध्यक्ष पद के लिए सुभाष जी ही सही है.

प्रफुल्लचंद्र राय और मेघ्नाद्र जैसे महान वैज्ञानिक भी सुभाष की फिर अध्यक्ष के रूप मे देखना चाहते थे मगर गाँधी जी ने किसी की भी बात नहीं सुनी और कोई समझौता नहीं किया.

जब महात्मा गाँधी जी ने पट्टाभी सीतारामैय्या का साथ दिया और उधर सुभाष जी ने भी चुनाव में अपना नाम दे दिया|

चुनाव में सुभाष जी को 1580 मत और पट्टाभी सीतारामैय्या को 1377 मत प्राप्त हुए और सुभाष जी जीत गए| मगर गाँधी जी ने पट्टाभी सीतारामैय्या हार को अपनी हार बताया और अपने कांग्रेस के साथियों से कहा की अगर वे सुभाष जी के तौर तरीके से सहमत नहीं है तो वो कांग्रेस से हट सकते है.

इसके बाद कांग्रेस में 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया| जवाहर लाल नेहरु तटस्थ बने और शरदबाबु सुभाष जी के साथ रहे.

सन् 1939 का वार्षिक अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ| इस अधिवेशन के समय सुभाष जी को तेज बुखार हो गया और वो इतने बीमार थे की उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर अधिवेशन में लाया गया.

गाँधी जी और उनके साथी इस अधिवेशन में नहीं आये और इस अधिवेशन के बाद सुभाष जी ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की मगर गाँधी जी ने उनकी एक न सुनी.

स्थिति ऐसी थी की वे कुछ नहीं कर सकते थे| आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष जी ने इस्तीफा दे दिया.

नजराबंदी से पलायन : सुभाष चंद्र बोस की जीवनी

16 जनवरी 1941 को वे पुलिस को चकमा देते हुए एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन के वेश में अपने घर से निकले.

शरद बाबू के बड़े बेटे शिशिर ने उन्हें अपनी गाडी में कोलकाता से दूर गोमोह तक पहुँचाया| गोमोह रेलवे स्टेशन से फ्रंटियर मेल पकड़कर वे पेशावर पञ्च गए.

उन्हें पेशावर में फोरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी, मियां अकबर शाह मिले| मियां अकबर शाह ने उनकी मुलाकात, कीर्ति किसान पार्टी के भगतराम तलवार से करा दी.

भगतराम के साथ सुभाष जी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की और निकल गए| इस सफ़र में भगतराम तलवार रहमत खान नाम के पठान और सुभाष उनके गूंगे-बहरे चाचा जी बन गए| पहाड़ियों में पैदल चल कर सफ़र पूरा किया.

सुभाष जी काबुल में उत्तमचंद मल्होत्रा एक भारतीय व्यापारी के घर दो महिने रहे| वहां उन्होंने पहले रुसी दूतावास में प्रवेश पाना चाहा| इसमें सफलता नहीं मिली तब उन्होने जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की| इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही.

जर्मन और इतालियन के दुतावसों ने उनकी मदद की| अंत में आरलैंड मैजोन्टा नामक इटालियन व्यक्ति के साथ सुभाष काबुल से निकल कर रूस की राजधानी मास्को होते हुए जर्मनी राजधानी बर्लिन पहुचे.

हिटलर से मुलाकात – Story About Netaji Subhash Chandra Bose and Hitler

सुभाष बर्लिन में कई नेताओं के साथ मिले उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संघठन और आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की|

इसी दौरान सुभाष नेताजी के नाम से भी मशहूर हो गए| जर्मन के एक मंत्री एडम फॉन सुभाष जी के अच्छे मित्र बन गए.

29 मई 1942 के दिन, सुभाष जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडोल्फ हिटलर से मिले| लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूचि नहीं थी| उन्होने सुभाष की मदद को कोई पक्का वादा नहीं किया.

हिटलर ने कई साल पहले माईन काम्फ़ नामक आत्मचित्र लिखा था.

इस किताब मैं उन्होंने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी| इस विषय पर सुभाष ने हिटलर से अपनी नाराजगी दिखाई, हिटलर ने फिर माफ़ी मांगी और माईन काम्फ़ के अगले संस्करण में वह परिच्छेद निकालने का वादा किया.

अंत में सुभाष को पता लगा की हिटलर और जर्मनी से किये वादे झुटे निकले इसलिए 8 मार्च 1943 को जर्मनी के कील बंदरगाह में वे अपने साथी आबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर पर्वी एशिया की और निकल दिए.

वह जर्मनी पनडुब्बी उन्हें हिन्द महासागर में मैडागास्कर के किनारे तक लेकर गयी| फिर वहां दोनों ने समुद्र में तैरकर जापानी पनडुब्बी तक पहुचे.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किन्ही भी दो देशों की नौसेनाओं की पनडुब्बियों के द्वारा नागरिकों की यह एक मात्र अदला-बदली हुई थी, वो जापनी पनडुब्बी उन्हें इंडोनेशिया के पादांग बंदरगाह तक पहुचाकर आई.

सुभाष चन्द्र जी की मृत्यु का कारण क्या था ?

सुभाष चन्द्र जी की मृत्यु का कारण क्या था

जापान द्वितीय विश्वयुद्ध में हार गया, सुभाष जी को नया रास्ता निकलना जरुरी था| उन्होंने रूस से मदद मांगने की सोच रखी और 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मचुरिया की तरफ जा रहे थे| इस सफ़र के दौरान वे लापता हो गए| इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिए.

23 अगस्त 1945 को रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक वीमान से आ रहे थे की 18 अगस्त को जापान के ताइहोकू हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटीत हो गए.

विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदाई पाईलेट और कुछ अन्य लोग मारे गए| नेताजी गंभीर रूप से जल गए थे.

वहां जापान में अस्पताल में ले जाया गया और जहाँ उन्हें मृत घोषीत कर दिया गया और उनका अंतिम संस्कार भी वही कर दिया गया.

सितम्बर में उनकी अस्थियों को इकठ्ठा करके जापान की राजधानी टोकियो के रैकाजी मंदिर में रख दी गयी| भारतीय लेखागार ने सुभाष जी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात्रि 09:00 बजे हुई थी.

आजदी के बाद भारत सरकार ने इस घटना की जांच करने के लिए सन् 1956 और 1977 में दो बार जांच आयोग नियुक्त किया गया पर दोनों बार ये साबित हुआ की दुर्घटना में ही सुभाष जी की मृत्यु हुई थी.

सन् 1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया| 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया की ताइवान की भूमि पर उस दिन कोई जहाज दुर्घटना हुई ही नहीं थी| मुखर्जी आयोग रिपोर्ट पेश की जिसमे सुभाष जी की मृत्यु का कोई साबुत पाया नहीं गया.

लेकिन भारत के सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया.

आज तक ये रहस्य ही बना हुआ है की आखिर सुभाष जी की मृत्यु कैसे हुई थी और अभी 2018 से करीब एक दो साल पहले न्यूज रिपोर्ट द्वारा ये बात सामने आई थी की सुभाष जी कुछ साल बाद भी जिन्दा थे और वेश बदल कर जी रहे थे.

फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छतिसगढ राज्य में जिला रायगढ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे किये गए लेकिन कोई साबुत सामने नहीं आया.

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