त्यौहार

महाशिवरात्रि के दिन इस तरह करें भगवान शिव को प्रसन्न

महाशिवरात्रि का महत्व और निबंध
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महाशिवरात्रि का महत्व: 2021 में महाशिवरात्रि 11 मार्च 2021 को मनाई जाएगी।

हर साल की तरह इस बार भी भगवान शिव के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। शिव भक्त तो पहले से ही शिवरात्रि का इन्तजार करते है और इस दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना करते है और अपनी इच्छाएं आदि भगवान के सामने रखते है।

महाशिवरात्रि को ‘शिव जी की महान रात’ के रूप में मनाया जाता है।

शिव भक्त इस दिन सुबह सुबह करीब 4-5 बजे उठकर ठंडे पानी से स्नान कर भगवान शिव को दूध बेलपत्र भांग आदी चढ़ाते है।

महाशिवरात्रि हिन्दुओं का सबसे शुभ और प्रसिद्ध त्योहार माना जाता है और आखिर माना क्यों न जाये ये हमारे देवों के देव महादेव शिव शंकर जी का त्यौहार है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर भक्त भगवान शिव की पूजा कर फल और फूल अर्पित करते है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, महाशिवरात्रि का त्योहार फाल्गुन के महीने में मनाया जाता है।

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About Mahashivratri 2021 in Hindi

  • महाशिवरात्रि कहां मनाई जाती है?

गुजरात का सोमनाथ और उज्जैन का महा कालेश्वर मंदिर भगवान शिव के प्राचीन मंदीर है जहां हर साल शिवरात्रि के शुभ अवसर पर लाखों की तादाद में भक्त दर्शन करने आते है और उनके भक्त गंगा स्नान के लिए हरिद्वार, वाराणसी जैसी जगह भी जाते है। वहां पूजा कर गंगा स्नान भी करते है।

Mahashivratri Essay in Hindi

Essay on Mahashivratri in Hindi

महाशिवरात्रि के दिन क्या करें?

शिव भक्त सदियों से अनुशासन और समर्पण के साथ महाशिवरात्रि का उपवास करते आ रहे है। शास्त्रों का कहना है अगर कोई भक्त पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ इस व्रत को करता है तो भगवान शिव शिवरात्रि के दिन सूर्यास्त के बाद उसे सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर समृद्धि और आशीर्वाद देते हैं।

इस दिन शाम को भी भोजन नहीं किया जाता हैं। अगले दिन अमावस्या की सुबह पूजा करने के बाद ही भोजन किया जाता है। जो लोग किसी कारणवश इस दिन के व्रत का पालन नहीं कर पाते वे लोग फल, दूध से बने पदार्थ का सेवन कर सकते है।

महाशिवरात्रि के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद अपने प्रिय देवता के दर्शन के लिए मंदिर जाते हैं। शिव भक्त इस दिन देवता का अभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि के दिन अभिषेक को काफी अहम माना जाता है।

इस दिन शिव भक्त ओम नम: शिवाय मंत्र के उच्चारण के साथ शिवलिंग पर दूध, शहद, दही और चंदन से अभिषेक करते हैं इसके अलावा बेर, बेलपत्र और फूल आदि भी भगवान को अर्पित किए जाते हैं।

अगर आप भी चाहें तो इस दिन को भगवान शिव की पूजा करके अपने दुख दर्द मिटा सकते है और जीवन सफल बना सकते है। यकीन मानिए अगर आपको मन की शांति चाहिए तो आप भगवान शिव की पूजा पाठ में लग जाए पूरे साल न सही केवल इस दिन भगवान शिव की पूजा करके देखें आपकी मनोकामना जरूर पूरी होगी।


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महाशिवरात्रि पर निबंध और महत्व

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महादेव जी को नटराज, नीलकंठ, भोला आदि भी कहा जाता है।

शिव जी अपनी ही धुन में लिन रहते है वे केवल अपने भक्तों की ही नहीं बल्कि सभी लोगों की मनोकामना पूरी करते है।

कहा जाता है कि स्त्रियां इस दिन उपवास भी करती है ताकि उनकी मनोकामना पूरी हो।

शिव जी ही एक ऐसे भगवान है जो अपने भक्तों की सबसे पहले सुन लेते है और बिना मांगे ही सब कुछ दे देते है। वह अपने भक्तों को दुखी नहीं देख सकते है। इस दिन का मौका नहीं छोड़ना चाहिए जो मन में आए भगवान के सामने जाकर मांग लेना चाहिए और मेरा यकीन मानिए आपकी मनोकामना पूरी होगी।

महाशिवरात्रि का महत्व त्यौहार एक दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। महाशिवरात्रि की पूरी रात पूजा और कीर्तन होता है।

आपको कई पुराण के अंदर शिवरात्रि का उल्लेख मिलेगा, विशेषकर:-

1.स्कंद पुराण
2.लिंग पुराण
3.पद्म पुराण

इन पुराण में महाशिवरात्रि का उल्लेख है।

शिव धर्म परंपरा की एक पौराणिक कथा अनुसार, यह वह रात है जब भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था। हालांकि कुछ ग्रंथों में यह दावा किया गया है कि महाशिवरात्रि को भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था।

कुछ उत्साही भक्त पूरे विधि-विधान के साथ महाशिवरात्रि का उपवास करते हैं। कुछ भक्त इस दिन भांग आदि बाटते है, भंडारे करवाते है, खीर पूरी आलू की सब्जी आदि बटवाते है। इसके अवाला कुछ शिवभक्त उपवास के दौरान एक बूंद पानी भी नहीं पीते।

ज्यादातर भक्त व्रत के दौरान फल के साथ दूध और पानी का सेवन करते हैं।

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महा शिवरात्रि का मुहूर्त 2021

प्रश्न ये उठता है कि शिवरात्रि के दिन हमें पूजा कितने बजे करनी है?

2021 शिवरात्रि मुहूर्त

2021 में महाशिवरात्रि कब है?

शिवरात्रि 2021 का यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष एक खास मौके पर आता है और ये इस बार 2021 में 11th मार्च गुरुवार के दिन महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाएगा।

महाशिवरात्रि का दिन शिव भक्तों के लिए बहुत ही मायने रखता है। शिवरात्री के दिन लोग अपनी इच्छाएं भगवान शिव से मांगते है।

महाशिवरात्री के पावन पर्व साल में एक बार ही मनाया जाता है। शिवरात्रि के दिन भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामना को पूरा करते है।

भगवान शिव को भोला भंडारी भी कहा जाता है, उन्हे भोला भंडारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि भगवान शिव बड़े ही दयालु है और उन्हे किसी भक्त पर बड़ी ही जल्दी दया आ जाती है और उन्हे मुंह मांगा वरदान दे देते है।

भगवान शिव सबके कल्याण के लिए हमेशा तत्पर रहते है।

महाशिवरात्रि 2021 की पूजा विधि और पूजा का समय निम्नलिखित है

  1. निशिता काल पूजा समय: 12:06 am से 12:55 am है ये 11 मार्च 2021 का समय है।
  2. मार्च के दिन 06:34 am से 03:02 pm का समय दिया गया है।

महाशिवरात्रि पूजाविधि 2021: Mahashivratri Puja Vidhi in Hindi

Mahashivratri Puja Vidhi

महाशिवरात्रि को पूजा करने की विधि में पूजा करते वक्त सबसे पहले मिट्टी के बर्तन में पानी भर ले, ऊपर से बेलपत्र, धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ा दें। अगर घर के पास शिव मंदिर न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर भी पूजा की जा सकती है।

स्वयं शिवलिंग बना कर पूजा करने में अलग ही आनंद आता है। वहीं इस दिन शिव पुराण का पाठ सुनना चाहिए और पाठ करना चाहिए और हो सके तो शिव भगवान का पाठ पढ़ कर अन्य लोगों को सुनाना भी चाहिए।

चारों प्रहर के पूजन में शिव पंचाक्षर (नम: शिवाय) मंत्र का जाप करेंभव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से फूल अर्पित कर भगवान शिव की आरती व परिक्रमा करें।

अगर आपने व्रत नहीं किया है तो आपको सामान्य पूजा तो अवश्य करनी चाहिए जिसमें शिवलिंग को पवित्र जल, दूध और मधु से स्नान करवाएं। भगवान को बेलपत्र अर्पित करें, इसके बाद धूप बत्ती करें फिर दीपक जलाएं। ऐसा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। इस दिन इन दो मंत्रों का जाप करें।

शिवरात्रि व्रत की विधि

महाशिवरात्रि का महत्व: भगवान शिव की पूजा-वंदना, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को व्रत रखा जाता है। लेकिन सबसे बड़ी शिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी होती है इसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है।

वर्ष 2021 में महाशिवरात्रि का व्रत 11 मार्च को रखा जाएगा।

गरुड़ पुराण के अनुसार शिवरात्रि से एक दिन पूर्व त्रयोदशी तिथि में शिव जी की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए और इसके उपरांत चतुर्दशी तिथि को निराहार रहना चाहिए।

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को जल व दूध चढ़ाने पर विशेष पुन्य प्राप्त होता है।

शिवरात्रि के दिन शिव जी की मूर्ति और शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर “ॐ नमो नम: शिवाय” मंत्र से पूजा की जानी चाहिए। इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा होनी चाहिए और अगले दिन प्रात: काल ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण होना चाहिए।

गरुड़ पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव को बेल पत्र अर्पित होना चाहिए। भगवान शिव को बेल पत्र बेहद प्रिय हैं। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को रुद्राक्ष, बेल पत्र, भांग, शिवलिंग और काशी अतिप्रिय हैं।

शिवरात्रि पर किस मंत्र का जाप करें?

महामृत्‍युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम् मृतात् ।।

शिव वंदना

ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम्।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम्।।
वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम्।
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम्।।
Essay on Mahashivratri in Hindi

शिवरात्रि का त्यौहार कब आता है?

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हिन्दू पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि फाल्गुन हिंदी माह के कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी को मनाया जाता है।

ऐसे तो हर माह के कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि पर्व होता है लेकिन फाल्गुन के माह का ये त्यौहार ज्यादा महत्व रखता है। 12 महीने में फाल्गुन के महीने में ये त्यौहार काफी महत्व रखता है।

कहा जाता है कि इस दिन संसार के निर्माण में इस दिन के मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रूद्र के रूप में अवतार हुआ था और प्रलय के समय भगवान शिव ने तांडव करते हुए अपनी तीसरी आंख की ज्वाला से पूरे संसार को खत्म कर दिया था जिसकी वजह से इस दिन को “कालरात्रि” भी कहा जाता है।

प्रिय लोगों में आपको बता दूँ की वैसे तो भगवान की पूजा करने के लिए किसी समय का इंतजार नहीं किया जाता है। जब मन में आये तभी आप भगवान का नाम ले सकते हो और दिल से भगवान का नाम लेने से आप को बहुत सकारात्मक शक्तियां मिलेंगी और इस जीवन में सब कुछ अच्छा लगने लगेगा और सब कुछ कर सकते हो जो आप करना चाहते हो बस अपने आप पर और भगवान पर भरोसा रखो हमेशा आपकी जीत होगी।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

महाशिवरात्रि कथा हिंदी में: भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी में वर्चस्व को लेकर युद्ध हो गया। फाल्गुन में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात को शिवरात्रि कहा जाता है और शिव महापुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी में वर्चस्व को लेकर युद्ध हुआ तब उन दोनों के बीच में एक शिवलिंग प्रकट हुआ।

शिवलिंग के दर्शन कर दोनों ने विचार किया की जो इस शिवलिंग का शुरू और अंत तक का दर्शन कर लेगा वही पूजनीय माना जाएगा.

तब ब्रह्मा जी ने हंस के रूप में और विष्णु जी ने शुकर के रूप में आकाश व् पाताला को गए.

आकाश में जाते हुए ब्रह्मा जी को केतकी का फूल मिला तो उन्होंने पूछा कि वह प्रारंभ से आ रहे है क्या?

केतकी के फूल ने कहा कि वह तो मध्य भाग से हजारों वर्षों से गिरता आ रहा है।

ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से कहा

ब्रह्मा जी ने कहा कि हे केतकी के फूल मैं तुम से निवेदन करता हूँ कि तुम विष्णु जी के सामने कह देना की ब्रह्मा जी ने शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा देख लिया है तो केतकी के फूल ने ऐसा ही किया।

विष्णु जी के सामने ब्रह्मा जी के कहने पर केतकी के फूल ने कहा कि उन्होंने शिवलिंग के उपर का हिस्सा देख लिया है।

विष्णु जी ने ये सब सुना और ब्रह्मा जी की पूजा की तभी शिवलिंग में से भगवान शिव जी प्रकट हुए उन्होंने भैरव प्रकट किया और गुस्से में ब्रह्मा जी के झूठ बोलने की वजह से उनका पांच मुखों में से जिस मुख ने झूठ बोला था उसका छेदन करवा दिया। अंत में विष्णु जी ने निवेदन किया तो शिव जी ने ब्रह्मा जी को अभय दान दिया। जिस दिन ये कार्य हुआ था उसी दिन को भगवान शिव जी के कहने पर शिवरात्रि के रूप में जाना जाने लगा।

वैसे कहा जाता है कि संसार का जन्म इसी दिन हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन संसार सृष्टि आरम्भ अग्निलिंग (जो शिव जी का विशालकाय रूप है) के उदय से हुआ। बहुत लोग ये मानते है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। साल में वैसे तो 12 शिवरात्रियों को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

नेपाल में महाशिवरात्रि का महत्व व इतिहास

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पशुपति नाथ में शिवरात्रि :

नेपाल में विशेष रूप से पशुपति नाथ मंदिर में महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि के पर काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में भक्तजनों की भीड़ लगी रहती है। इस अवसर पर भारत सहित विश्व के विभिन्न स्थानों से जोगी, साधू, एवं भक्तजन इस मंदिर में आते हैं।

शिव जी ने योग परम्परा की शुरुआत की थी जिसकी वजह से उन्हें (प्रथम) गुरु माना जाता है। परंपरा के अनुसार, इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मानव प्रणाली में ऊर्जा की एक शक्तिशाली प्राकृतिक लहर बहती है। इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से फायदेमंद माना जाता है इसलिए इस रात जागरण की सलाह भी दी गयी है जिसमें शास्त्रीय संगीत और नृत्य के विभिन्न रूप में प्रशिक्षित विभिन्न क्षेत्रों से कलाकार पूरी रात प्रदर्शन करते हैं।

शिवरात्रि को महिलाओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं व अविवाहित महिलाएं भगवान शिव, जिन्हें आदर्श पति के रूप में माना जाता है जैसे पति के लिए प्रार्थना करती हैं।

शिवरात्रि पर शिकारी की कहानी और कथा

शिवरात्रि की कहानी और कथा

चित्रभानु नामक एक शिकारी पशुओं की हत्या करके अपने घर को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका कर्ज समय पर न चुका सका। गुस्से में साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में कैद कर लिया। उस दिन शिवरात्रि थी.

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी| संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और कर्ज चुकाने के विषय में बात की| शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया.

रोज की तरह वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूखा प्यासा था| शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष के पास गया| बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था| शिकारी को उसका पता न था.

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिव लिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए| एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची.

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली….

“मैं गर्भिणी हूँ| शीघ्र ही प्रसव करूंगी| तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है| मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।”

शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई.

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया| तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया,

“हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं| कामातुर विरहिणी हूं| अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं| मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।”

शिकारी ने उसे भी जाने दिया| दो बार शिकार को खो दिया और वह चिंता में पड़ गया| रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था| तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली| शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था| उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई| वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली,

“हे पारधी!” मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी| इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं| इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं| मेरे बच्चे भूख प्यास से तड़प रहे होंगे.

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी| इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं| हे पारधी! मेरा विश्वास करे, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं|

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई| उसने उस मृगी को भी जाने दिया| शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था| पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया| शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा.

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े.

मैं उन मृगियों का पति हूं| यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा.

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी| तब मृग ने कहा,

“मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी| अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो| मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।”

उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था.

धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा.

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई.

उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई| उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया.

देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे| घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की| तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए.


प्रिय मित्रों महाशिवरात्रि का महत्व का यह लेख यही समाप्त होता है। मुझे उम्मीद है की आपको लेख पसंद आया होगा।

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“हर हर महदेव”

नोट: इस पर्व में भांग अत्यधिक न पियें यदि आप पीतें है तो ये भगवान का प्रसाद तो होता है मगर अत्यधिक पिने से नुकसान भी होता है।

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